Bhatnagar Sabha, Udaipur
     
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History of Bhatnagar
 
 
भटनागर का उदगम

१- संस्कृत के दो शब्दों “भट” अर्थात् ज्ञानवान, विद्धान तथा “नागर” अर्थात् चतुर, शिष्ट का संयुक्त रूप भटनागर है।

२- श्री चित्रगुप्त जी महाराज के दो विवाह हुए। एक महारानी नन्दिनी से तथा दूसरा महारानी एरावती से। महारानी नन्दिनी से चार पुत्र हुए तथा महारानी एरावती से आठ पुत्र हुए, इन १२ पुत्रों से कायस्थ कुल के १२ वंश चले। नन्दिनी सूर्यदेव के पुत्र श्री सिद्धदेव की पुत्री थी अतः इनके चारों पुत्र भानु, विभानु, विश्वभानु तथा वीर्यभानु सूर्यवंशी कहलाये। श्री चित्रगुप्त जी की दुसरी पत्नी महारानी एरावती (शोभावती) से जो आठ पुत्र चारू, सुचारू, चित्र, चित्रचारू, मतिमान, हिमवान, अतिन्द्रिय तथा चारूस्त हुए उनमें चित्र के वंशज भटनागर कहलाए।

चित्र ऋषि भट के एक शिष्य थे। उनका विवाह देवी भद्रकालिनी नागराज वासुकी की पुत्री के साथ हुआ तथा वे ईष्ट देवी जयंती की पूजा अर्चना करते थे। श्री चित्रगुप्त जी ने उन्हे भट नदी क्षैत्र मे अपना साम्राज्य स्थापित करने हेतु भटदेश व मालवा भेजा। उन्होने वहा जाकर चित्तौड व चित्रकूट की स्थापना करी और इनका परिवार भटनेर क्षेत्र में जाकर बस गया अतः इनको भटनागर कहा जाने लगा।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि पंजाब प्रदेश में भट नदी के तट पर भटनगर (अटक) था। वहाँ के मूल निवासी भटनागर कहलाए। एक आम धारणा के अनुसार भटनागर बिरादरी का मूल स्थान भटनेर है। १८०५ ईस्वी में भटनेर का नाम हनुमानगढ रखा गया जो वर्तमान में बीकानेर में स्थित है।

चित्तौड राजस्थान का ऐतिहासिक स्थल है। जहाँ बाद में राजा रत्नसिंह ने शासन किया। चित्रकूट भारत का सांस्कृतिक तीर्थ स्थान है, जो कि मध्यप्रदेश के सतना जिले तथा उत्तरप्रदेश के बांदा जिले की सीमा पर स्थित है। इसी प्रकार राजा चित्रा ने भटदेश (मालवा) को विजय करक शासन किया। कन्नोज भी उसी भटदेश का भाग था। १०१८ ई० में जब महमूद गजनवी ने कन्नोज पर आक्रमण किया तब प्रतिहार( प्रतिहार उनको कहते थे जो किसी अन्य केन्द्रिय शासन व्यवस्था के तहत शासन करे) कायस्थ शासक राजपाल वहाँ का राजा था।

इसी वंश में राजा ऋषिराज हुए जिन्होनें कश्मीर की वर्तमान राजधानी श्रीनगर को बसाया था। भटनागर परिवार के प्रतिहार वंश का प्रतापी शासक नागभट्ट हुआ जिसने पूर्वी राजस्थान तथा मालवा पर शासन किया।

कायस्थ परिवारों ने भारतवर्ष की पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं की सदैव सुरक्षा की और हमलावरों को भारतवर्ष में प्रवेश नहीं करने दिया। माता नन्दिनी के चार पुत्रों के वंशज पश्चिमि भारत में तथा माता एरावती के आठ पुत्रों के वंशजों ने पूर्वी भारत को अपना कर्मक्षेत्र बनाया। इतिहास साक्षी है कि राजा जयपाल और उसके पुत्रों के परास्त हो जाने के बाद ही बाहरी हमलावर शासक भारतवर्ष में प्रवेश कर पाये। राजा जयपाल और उसके पुत्रों की पराजय भारतवर्ष की पराजय थी।

समय के साथ भटनागर परिवार के वंशज अपने कारोबार तथा जीविकोपार्जन हेतु दूर दराज के क्षेत्रों में जाकर बस गये। लम्बे समय तक उन स्थानों पर रहने के कारण उनके नाम के साथ उस स्थान का नाम गौत्र या अल के रूप में जुड गया। जैसे- नागोरी, जालोरी, डाकोत आदि। इसी प्रकार कुछ परिवारों द्वारा लम्बे समय तक शासन व्यवस्था में कार्य विशेष से जुडे रहने के कारण उन्हें गौत्र के अतिरिक्त उपनामों से भी जाना जाने लगा । जैसे- फराशखानावाला, सहीवाला, महासानी, बक्षी, भण्डारी आदि।

३- श्री चित्रगुप्त जी ने अपने पुत्रों को जीवन में कुछ नियमों का पालन करने की सीख दी थी। उनमें से प्रमुख निम्न है। -
  • तुम ब्राह्मण वृत्ति के हो किन्तु कदापि भौतिक दान ना लेना तथा अरिष्ट कर्मों में भोजन ग्रहण ना कराना।
  • तुम ब्राह्मण के समान शास्त्रों का सम्पूर्ण ज्ञान रखना और अपने जीवन में कभी विद्या का अभाव अथवा अज्ञान का अंधकार ना आने देना।
  • तुम क्षत्रियों के समान शस्त्र विद्या का सम्पूर्ण ज्ञान रखना और अपने शस्त्रों को केवल अच्छे कार्यों के लिये धारण करना।
  • तुम अपनी लेखनी का सदैव सम्मान करना, उसको कभी ना त्यागना तथा उसकी पूजा करना।
  • तुम लेखक वृत्ति के हो और अपनी लेखक व गणक वृत्ति को अपने जीविकोपार्जन का माधम बनाना।
४- श्री चित्रगुप्त के १२ पुत्रों का विवाह नागराज वासुकी की १२ पुत्रियों के साथ सम्पन्न हुआ इसलिये नागवंश को कायस्थों को ननिहाल कहा जाता है।

 
उदयपुर भटनागर परिवारो में प्रचलित प्रमुख गौत्र
 
चौण्डावत  जालोरी बुन्देला खेराडा डाकोत गुडेलिया  कालावत 
गोगावत मोलावत नागौरी सरसीवाल मेहता पचवारिया  टोहानिया  कश्यप मेहता 
देवडा  सांचोरा  भूसीवाल गोरावत च्यवन बबेरिया  फिरोजाबादी
गढीवाल बुढानिया महसानी कोशल डोबीवाल  केरानिया  कानूनगो 
सवालकिया कश्यप  गोहानिया  हिसारिया  भण्डारी  बसंल डसानिया 
काशिवा