Bhatnagar Sabha, Udaipur
     
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History of Comunity
 
 
आराध्यदेव श्री चित्रगुप्त जी महाराज का प्राकट्य

आदिकाल में सृष्टि रचना के पूर्व संसार अंधकारमय था। सनातन परमब्रह्म्र परमात्मा ने सगुण रूप से सृष्टि की रचना की एवं समस्त ब्रम्हाण्ड का निर्माण हुआ । स्थूल सृष्टि कर रचना पंच महाभूतों यथा आकाश, वायु, अग्नि, जल, एवं पृथ्वी से हुई । विराट पुरूष नारायण भगवान के संकल्प से ब्रम्हा जी की उत्पत्ति हुई । पुराणों के अनुसार क्षीर सागर में भगवान विष्णु के नाभि कमल से ब्रम्हा जी प्रकट हुए। उन्हें जीव जगत की रचना करने का आदेश हुआ । घोर तपस्या के पश्चात उन्होनें ब्रम्हाण्ड की रचना की । ब्रम्हाजी के मुख से ब्राम्हण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य, तथा पैरों से शुद्रों की उत्पत्ति हुई । कालान्तर में सृष्टि की उत्पत्ति एवं जीव जन्तुओं के कर्मों का विस्तार होने पर ब्रम्हाजी ने सूर्यपुत्र यम को धर्म प्रधान बनाकर सभी लोकों का अधिकार इस विश्वास के साथ सौंपा कि सभी जीवों को उनके किये गये कर्मों के अनुसार फल मिले ।

यमपुर के शासन- संचालन और समस्त ब्रम्हाण्ड के जीव जन्तुओं के कर्मों का लेखा-जोखा रखने में कठिनाईयों को देखते हुए धर्मराज ने अपने लिये एक श्रेष्ट सहयोगी की प्रार्थना की । धर्मराज की इस प्रार्थना से ब्रम्हा जी असमंजस में पड गए, क्योंकि उन्हें लगा कि धर्मराज को दिये गए सहयोगी द्वारा जातिगत आधार पर अपनी जाति के लोगों का पक्ष लेने का सदैव भय रहेगा । धर्मराज के लिये श्रेष्ठ सहयोगी की चाहना में ब्रम्हा जी ने ग्यारह हजार वर्षों की घोर तपस्या की। जब उनकी तपस्या पूर्ण हुई और ब्रम्हा जी ने नैत्र खोले तो देखा कि उनके सम्मुख एक श्याम वर्ण, कमल नयन, शंख तुल्य ग्रीवा, लम्बी भुजाओं वाला, सुडौल दिव्य चतुर्भुजी पुरूष एक हाथ में असि(तलवार), दूसरे में कालदण्ड, तीसरे में लेखनी और चौथे में बहीखाता धारण किये उपस्थित है। ब्रम्हा जी ने कहा- ” हे पुत्र! तुम्हारा स्वरूप अर्थात् चित्र मेरे मानस में अहम्य गुप्त रहा है इस कारण तुम्हारा नाम चित्रगुप्त होगा एवं जन्म से पूर्व तुम मेरी काया में स्थित थे इस कारण तुम्हारी जाति कायस्थ होगी । शास्त्रों में वर्णित धर्म व्यवस्था के अनुरूप न्याय व्यवस्थापन में तुम श्रेष्ठ हो इसलिये तुम धर्मराज की सहायता करोगे ।

ब्रम्हा जी से आज्ञा प्राप्त कर भगवान श्री चित्रगुप्त जी अवन्तिकापुरी जाकर शिप्रा नदी के पावन तट पर तप करने लगे। बारह हजार वर्षों के निरन्तर तप से प्रसन्न ब्रम्हा जी ने उनके महान तप की प्रशंसा कर उन्हें आशीर्वाद दिया कि- ” हे चित्रगुप्त! तुम महाज्ञानी एवं देवताओं में परम श्रेष्ठ होओगे। यज्ञ में द्विज आहुति से भोजन प्राप्त करने वाले होगे। तुम्हारा वंश अव्वल होगा तथा जो भी तुम्हारा पूजन और आराधना करेगा वह स्वर्ग का भागी होगा ।

 
भगवान श्री चित्रगुप्त जी का परिवार
 
श्री चित्रगुप्त जी महाराज ने देवी नन्दनी (दक्षिणा) व देवी एरावती (शोभावती) से विवाह किया तथा उनसे कुल 12 पुत्र हुये।
 
भटनागर 101 अल्लो मे विभाजित किये गये जो निम्नलिखित हैं